प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘टॉफी डिप्लोमेसी’ वाले वीडियो के अगले ही दिन न्यूज़ रूम में एंकर का यह अंदाज़ सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना; गंभीर पत्रकारिता बनाम इन्फोटेनमेंट पर छिड़ी बहस।
नई दिल्ली/नोएडा:
सोशल मीडिया के दौर में जब सियासत और मीम-संस्कृति (Meme Culture) का मिलन होता है, तो मुख्यधारा का मीडिया भी उससे अछूता नहीं रह पाता। ऐसा ही एक दिलचस्प और विमर्श खड़ा करने वाला नजारा आज देश के एक प्रमुख न्यूज़ स्टूडियो के भीतर देखने को मिला। जाने-माने न्यूज़ चैनल की वरिष्ठ एंकर चित्रा त्रिपाठी का गुलाबी साड़ी में एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वह हाथ में ‘मेलोडी’ टॉफी पकड़कर उसका मशहूर विज्ञापन डॉयलाग दोहराती नजर आ रही हैं।
क्या है वायरल वीडियो में?
वायरल हो रहे इस वीडियो में चित्रा त्रिपाठी स्टूडियो के भीतर पूरी तरह से एक नए रंग-ढंग में नजर आ रही हैं। हाथ में मेलोडी टॉफी थामे वह कैमरे की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए पूछती हैं— “मेलोडी इतनी चॉकलेटी क्यों है…?” और इसके तुरंत बाद वह बड़े चाव से टॉफी को गटक जाती हैं। सोशल मीडिया पर यूज़र्स इस वीडियो को ‘चित्रहार’ की संज्ञा दे रहे हैं और इस पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
मोदी-मेलोनी के वायरल वीडियो से जुड़ा है कनेक्शन
चित्रा त्रिपाठी द्वारा स्टूडियो में मेलोडी टॉफी खाने का यह वाकया महज़ इत्तेफाक नहीं है, बल्कि इसका सीधा कनेक्शन कल वायरल हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक वीडियो से है। दरअसल, कल ही सोशल मीडिया पर पीएम मोदी का एक वीडियो सामने आया था, जिसमें वह इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के साथ मुलाकात के दौरान ‘मेलोडी’ टॉफियों का पैकेट चमकाते और मुस्कुराते हुए नजर आए थे। इंटरनेट पर लंबे समय से चल रहे ‘मोदी + मेलोनी = मेलोडी’ ट्रेंड को खुद प्रधानमंत्री द्वारा इस तरह हवा दिए जाने के बाद यह विषय टॉक ऑफ द टाउन बन गया था, और अगले ही दिन न्यूज़ रूम से यह वीडियो सामने आ गया।
सवालों से भागना या सत्ता को खुश करने की कवायद? उठ रहे हैं सवाल
चित्रा त्रिपाठी के इस वीडियो के सामने आने के बाद सोशल मीडिया और मीडिया विश्लेषकों के बीच एक नई बहस छिड़ गई है। इस घटनाक्रम को लेकर दो तीखे दृष्टिकोण सामने आ रहे हैं:
- सत्ता को खुश करने का जरिया: आलोचकों और सोशल मीडिया यूज़र्स का एक बड़ा धड़ा इसे सीधे तौर पर प्रधानमंत्री के प्रति अपनी अनुकूलता दिखाने और सत्ता पक्ष को खुश करने की एक कोशिश के रूप में देख रहा है।
- गंभीर मुद्दों से ध्यान भटकाने का नैरेटिव: दूसरा और अधिक गंभीर आरोप यह लग रहा है कि जब देश में बेरोजगारी, महंगाई, प्रशासनिक विफलता और बुनियादी समस्याओं पर तीखे सवाल होने चाहिए, तब मुख्यधारा के प्राइम-टाइम चेहरे ‘टॉफी-चॉकलेट’ जैसे हल्के विषयों को रील्स और वीडियो के जरिए प्रमोट कर रहे हैं। इसे देश में फैली नकारात्मकता से जनता का ध्यान भटकाने और माहौल को हल्का-फुल्का बनाए रखने की एक सोची-समझी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
सूचना से ‘इन्फोटेनमेंट’ की ओर बढ़ती पत्रकारिता
यह पूरा घटनाक्रम इस बात का जीवंत प्रमाण है कि आज की टेलीविजन पत्रकारिता केवल गंभीर सूचनाएं देने तक सीमित नहीं रह गई है। सोशल मीडिया पर रीच (Reach) पाने, लाइक्स बटोरने और वायरल ट्रेंड्स का हिस्सा बनने की होड़ में अब न्यूज़ रूम भी रील्स स्टूडियो में तब्दील होते जा रहे हैं। चित्रा त्रिपाठी का यह वीडियो इसी बदलते दौर की पत्रकारिता पर एक बड़ा सवालिया निशान भी लगाता है और एक तीखा व्यंग्य भी पेश करता है।





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